रामसनेहीघाट,बाराबंकी (अमरेश दर्पण)।भगवान बारह अवतार क्षेत्र से जुड़ी बाराबंकी की माटी सदैव संतों महात्माओं ऋषियों मुनियों सूफी संतो की कर्मस्थली रहने के साथ ही भगवान शिव एवं विष्णु अवतारियों की पावन रही है।सतनामी पंथ सम्प्रदाय की बुनियाद डालने वाले संत शिरोमणि समर्थ जगजीवन दास साहेब को मानने वाले लोग उन्हें पुरी के विष्णु अवतार जगन्नाथ स्वामी मानते हैं और उनकी तपोस्थली कोटवा को धाम को अयोध्याधाम से कम नहीं मानते हैं।आजादी के पहले अंग्रेज भी साहेब के मुरीद थे और उनके क्षेत्र को माफी क्षेत्र घोषित कर दिया था।साहेब के नजदीकी शुरुआती दौर के उनके शिष्यों के गाँव ही चार पावा चौदह गद्दी के रूप में जाने जाते हैं।आज हम साहेब एवं सतनामी सम्प्रदाय के बारें मे प्रथम पावा कमोली धाम से जुड़े कमलेशदास जी से हमारे विशेष प्रतिनिधि द्वारा लिये गये एक विशेष इंटरव्यू के मुख्य अंश प्रस्तुत कर रहे हैं-
पिछले काफी अरसे से सतनामी प्रचार प्रसार एवं कोटवाधाम और उससे जड़ें सभी स्थानों एव शिष्यों से सम्पर्क करने में जुटे प्रथम पावा के कमलेशदास ने बताया कि सभी शिष्य जिस समय परम समर्थ स्वामी जगजीवन दास साहेब का अभ्युदय हुआ, उस समय तक देश में अनेकानेक मत, धर्म, संप्रदाय और पंथ प्रचलित थे जिनमें से गोरख पंथ, नाथ पंथ, स्वामी रामानंदी पंथ और कबीर पंथ उत्तर भारत में अपने चरम पर थे। नाथ पंथ और दादू पंथ देश में अपने वैभव को प्राप्त कर चुके थे। उस समय तक नानक पंथ की सीमाएं उद्घघटित हो चुकी थी। तत्कालीन धार्मिक परिस्थितियों की ओर संकेत मात्र है कि कबीर पंथ अपने समन्वय नीति और सामाजिक धार्मिक पाखंडो पर प्रहार के कारण अपनी लोकप्रियता अर्जित कर रहा था किंतु कबीर को हिंदू मुस्लिम दोनों पचा नहीं पा रहे थे। इन्हीं परिस्थितियों के मध्य समर्थ जगजीवन साहब के मन में विचार आया कि क्या कोई ऐसा संप्रदाय हो सकता है, जो इन सब कमियों को दूर करता एवं मिटाता हुआ, देश की आम जनता के हित में हो, जिसे गरीब का धर्म कहा जा सके।
कमलेशदास जी ने विशेष साक्षात्कार के दौरान बताया कि आज जितनी मान्यता कबीर की है उतनी उनके समय में नही थी और उन्हें सामाजिक उपहास का शिकार होना पड़ रहा था। कोई पंथ कनक कामिनी में लिपटा था, तो कोई नाम में था तो कोई पंथ इस मानव काया को ही सर्वोपरि मान कर उसे साधने का मार्ग सुझा रहा था। उस समय तक समाज में अस्पृश्यता, जात-पात, ऊंच-नीच तथा छुआछूत की दुर्भावना का बोलबाला था। जातिभेद एवं अर्थभेद की बढ़ती खाई ने समाज में दरारें डाल दी थी जिसके कारण आदमी आदमी के मध्य प्रेम, सहयोग की भावना न होकर दुराव खिंचाव और अलगाव की भावना बलवती हो रही थी। चरित्रगत, मनगत सुचिता के स्थान पर देहगत पवित्रता पर अधिक बल दिया जा रहा था जो कालांतर में केवल सामाजिक पाखंड बनकर रह गया। आर्थिक दृष्टि से समाज दुर्बल था लेकिन खाने पीने का अभाव तो नही था किंतु अतिवृष्टि अनावृष्टि तथा महामारियो के शिकार समाज को अनेक कष्ट सहने पड़ते थे। समाज में शिक्षा के अभाव के कारण सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के स्थान पर उनका संवर्धन अधिक हो रहा था। इसी कारण समर्थ जगजीवन दास साहब ने युग के अनुरूप एक नए पंथ का निर्माण किया जो सतनाम पंथ के नाम से जाना गया। यही कारण है कि समर्थ स्वामी जी को सतनाम धर्म का संस्थापक कहा जाता है। स्वामी जगजीवन साहब की रचनाओं में अजपा जाप, सहज समाधि, सहज जीवन के महत्व का वर्णन विशेष रूप से हुआ है। समर्थ साहेब ने कठिन योग साधना की अपेक्षा सहज योग को अधिक उपयोगी तथा श्रेष्ठ माना है।
सतनाम पंथ के प्रचार प्रसार में देश के विभिन्न राज्यों का भ्रमण कर चुके पूर्व पुलिस अधिकारी कमलेशदास ने कहा कि अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार शरीर तो भौतिक वस्तु है इसे नष्ट हो जाना है। सभी लोग शुद्ध हृदय से युक्त हो जाएं तो श्रेष्ठ समाज की स्थापना हो सकती है। समर्थ स्वामी जी ने जिस सतनाम पंथ की स्थापना की उसमें ऐसा सहज सरल मार्ग सुझाया जिसका अनुपालन लोगों के लिए आसान हो इसलिए उन्होंने गृहस्थ जीवन में रहकर लोगों को मुक्ति और मोक्ष का रास्ता सुझाया और कभी गृहस्थ जीवन त्याग कर सामाजिक पलायन कर हिमालय की वन कन्दराओ में न तो खुद गये और न ही अपने अनुयायियों को ही जाने का संदेश दिया है बल्कि अपने घर अर्थात हृदय में ही ढूंढने का सरल मार्ग बताया।उन्होंने सामाजिक सतनाम धर्म बनाया जो मनुष्य को एक संपूर्ण सामाजिक जीवन जीते हुए उसके सदगृहस्थ स्वरूप में ही धर्म और व्यक्ति के जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग की तरफ अग्रसर करता है।समर्थ साहब कहते थे-"मरि गए मुरदा भये, भला कहै सब कोई।
जगजीवनदास जे जीवित मुये, तिन्ह की पूजा होई।।
सतनाम पंथ के आदि प्रवर्तक समर्थ संत श्री जगजीवन साहब ने जनमानस को अपने शब्दों के जरिए ऐसी युक्त सिखाई है जो हरयुग में पूर्ण प्रासंगिक रहेगी। संतश्री ने कर्म प्रधान जीवन को प्रोत्साहित कर स्वाभिमान और सत्य की ताकत का हमेशा एहसास जनमानस को कराया। वह कहते थे कि-" जगजीवन जग आय कय, सत्यनाम की आस।कोटवा-कोटिन तीरथ है, जगजीवन के पास।
राधा बर सोई सियावर सोई सब घट राम।
जगजीवन दास जी अक्षरा, सोई है सतनाम।
उनके निकटतम शिष्य
संत दूलन दास जी ने सतनाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि हमारे अंतर्घट में प्रत्येक मनुष्य के अंदर पंचविकार काम, क्रोध, मद ,लोभ ,मोह सदैव व्याप्त रहते हैं ।इनकी मूल दवा औषधि सतनाम है हमारा सत गुर ही वैद्य है।वह उपरोक्त रोगों को सतनाम रूपी एक ही औषधि देकर 5व25 और कुल30 विकारों को समाप्त कर देता है।
यह परम सत्य है कि सतनाम का सुमिरन भजन ध्यान संत कबीर दास साहेब गुरु नानक जी संत दादू दयाल सहजोबाई दया भाई बावरी साहिबा बुलेशाह गुलाल साहब दरिया साहब भीखा साहब गोविंद साहब पलटू साहब सभी संतो ने विश्व में सबसे प्रथम बार सतनाम के प्रचार प्रसार के लिए जन जन तक पहुंचाने के लिए चार पावा 14 गद्दी36 महंत 33 भजन आनंदीयोको दीक्षित कर एक संगठनात्मक स्वरूप प्रदान किया है।संत जगजीवन दास साहेब का "अवतार संवत 1727 सन 1670 में गांव सरदार तहसील बदोसराय जनपद बाराबंकी में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री गंगाराम तथा माता का नाम कमला जी था ।आप चंदेल वंश क्षत्रिय थे और आपके पिता प्रतिष्ठित जमीदार थे।
सतनाम साहित्य एवं जन श्रुतियों के अनुसार संत जगजीवन साहब जगन्नाथ स्वामी पुरी के अवतार थे। आपका जीवन अनेक चमत्कारी घटनाओं से परिपूर्ण था ।सतनाम साहित्य शपथ चंद्रिका के अनुसार जब आप 3 माह के थे तो भगवान शिव स्वयं साधु वेश में दर्शन के लिए आए थे, और इनको अपने झोले में रख लिया आप 14 ब्रह्मांड का दर्शन कराया तथा आपके कान में तारक मंत्र प्रथम बार दिया और आपके मस्तक पर काला टीका लगा दिया जो जीवन पर्यंत अमिट रहा।संत जगजीवन दास साहेब के बाल काल में ही भक्ति के अंकुर अंकुरित हो चुके थे और 7 वर्ष की उम्र में ही सरदहा गांव मेंअघरन सरोवर के पास चबूतरा पर बैठकर ध्यान किया करते थे। 7 वर्ष की उम्र में पंडित द्वारा शिक्षा प्रदान के करने के लिए वेदी स्थापित करके ओम का उच्चारण करने के लिए कहा गया तो उन्होंने ओम का उच्चारण न करते हुए एकाछरी मंत्र का उच्चारण कर दिया।
संत जगजीवन दास द्वारा संस्थापित सतनाम पंथ में 14 गद्दियों में साहब मनसा दास (रैदास ) ,साहब प्यारे दास (धुनिया मुसलमान )जरौली , साहब कायम दास (पठान रसूलपुर )मवई, साहब बाल दास (कोरी )अमरा नगर, निकट बदोसराय आदि सभी धर्म जाति के लोगों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। आज भी सतनाम पंथ में जातिगत धर्म गत ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं है ।सभी धर्मों सम्प्रदायों और जा
तियों के लोग सतनाम संप्रदाय में दीक्षित हो रहे हैं।यह सत्य है कि जगजीवन साहब ने कोई शिक्षा नहीं प्राप्त की थी किंन्तु वह समाज सुधारक महान योगी संत एवं उच्च कोटि के कवि थे ।उन्होंने समाज के कल्याण 27 महा ग्रंथों की रचना की ।जिसे उनके शिष्यों ने लिपिबद्ध किया ।संत जगजीवन दास की सबसे महत्वपूर्ण रचना अघविनाश ब्रह्म महापुराण है जो उस समय मुल्तान से आए हुए केशवदास मुल्तानी ने लिपिबद्ध किया था ।अन्य रचनाएं भतीजे आह्लाद दास ने लिपिबद्ध किया था।
अविनास ब्रह्म महापुराण की रचना का महत्व सतनामियों के लिए उसी प्रकार से है जिस प्रकार से वेद पुराण गीता गुरु ग्रंथ साहब कुरान रामचरित मानस का महत्व है ।सतनामी इस ग्रंथ को महा पवित्र ग्रंथ मानते हैं।संत जगजीवन दास साहेब का महानिर्वाण सन 1761 में श्री कोटवा धाम में वैशाख शुक्ल पक्ष सप्तमी को हुआ था ।श्री कोटवा धाम में ही समाधि है श्री कोटवा धाम में साल में 13 मेलों का आयोजन होता है जिसमें जन्म सप्तमी, कार्तिक पूर्णिमा ,वैशाखी पूर्णिमा बड़े मेले हैं इसके अतिरिक्त हर पूर्णिमा और प्रत्येक मंगलवार और बृहस्पतिवार को हजारों की संख्या में श्रद्धालु भक्तजन समाधि का दर्शन कर निश्चित फल की प्राप्ति करते हैं।संत जगजीवन दास साहेब धार्मिक विचारधारा होने के नाते उनकी जन्मस्थली सरदहा के लोग उनका विरोध करते थे क्योंकि वहां पर हमेशा धार्मिक चर्चाएं और संतों की भीड़ भीड़ होती थी। जिसके कारण वह विरोध के चलते उन्होंने सरदहा को साधना के लिए उपयुक्त न पाकर उसे त्यागकर 5 किलोमीटर दक्षिण चले आए और जहां हिंसक जानवर निवास करते थे।उन्होंने 63 सालों तक कठोर तपस्या की उसी का परिणाम है कि आज सब धामों का धाम कोटवा धाम पावन तीर्थ हो गया है।
संत जगजीवन दास साहब ने समाज में व्याप्त कुरीतियों पाखंडवाद का खंडन करते हुए कहा कि समाज में ऊंच-नीच छुआछूत का भेदभाव व्याप्त है जातिगत आधार पर बर्तनों को छूने पर भी उच्च वर्ग के लोग उस बर्तन को छूना और प्रयोग करना पाप समझते हैं उन्होंने समाज को प्रेषित करते हुए कहा उपदेश हित करते हुए कहा कि-" साधो कलयुग आय के बर्तन लागे पाप।
कोरिन बांधी कंठी ब्राह्मण बांधै टॉप।
इंटरव्यू- सतनामी सम्प्रदाय के परिवर्तक कोटवाधाम के समर्थ साहेब जगजीवन दास पुरी के जगन्नाथ स्वामी थे